Supreme Court stays UGC’s new rules: Hearing continues; Court says implementing them in educational institutions could lead to dangerous consequences: यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: सुनवाई : कोर्ट ने कहा, शिक्षण संस्थानों में इन्हें लागू किया तो खतरनाक परिणाम होंगे

UGC:
♡•☆𝘳ℯᵃ₫Եⲏĩ𝐬♡•☆: Advice given to make school education 15 years: स्कूली शिक्षा 15 वर्ष करने की सलाह
शिक्षण संस्थानों में जाति भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को रोक लगा दी। साथ ही 2012 के पुराने नियमों को दोबारा से लागू कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा) नियमन, 2026 की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पीठ ने कहा, नए नियमन की भाषा अस्पष्ट है। यदि यह लागू होता है तो न सिर्फ खतरनाक परिणाम होंगे बल्कि समाज में विभाजन पैदा होगा। पीठ ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा।
2012 के नियम लागू रहेंगे: शीर्ष अदालत ने अनुच्छेद-142 के तहत मिली असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए यूजीसी नियमन, 2012 को फिर से लागू कर दिया। पीठ ने कहा, ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि पहले के नियमन रद्द करने से छात्रों के पास कोई उपाय नहीं बचेगा।
UGC:
जातिविहीन समाज हो : जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, देश को जातिविहीन समाज की दिशा में बढ़ना चाहिए। साथ ही स्पष्ट किया कि जिन लोगों पर भेदभाव का असर पड़ता है, उनके संरक्षण के लिए प्रभावी तंत्र भी बने। वहीं, जस्टिस बागची ने कहा, संस्थानों में एकता, समावेशिता का भाव दिखना चाहिए। यदि 2012 के नियमों में व्यापक सुरक्षा की बात है तो सामाजिक न्याय की सुरक्षा वाले कानून में बचाव के उपाय नहीं होने चाहिए? हम ऐसे स्तर पर न जाएं जहां अमेरिका की तरह स्कूलों को अलग कर दिया गया हो।

अदालत ने ये सवाल उठाए: UGC
- शैक्षिक संस्थानों में रैगिंग को नियमों के दायरे से बाहर क्यों रखा गया
- जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित क्यों किया गया है
- जातिविहीन समाज की दिशा में हम उल्टी दिशा में क्यों चल रहे हैं
UGC:
नए नियमन की भाषा अस्पष्ट है और यदि मौजूदा स्वरूप में लागू होता है तो न सिर्फ इसके खतरनाक परिणाम होंगे बल्कि समाज में विभाजन पैदा हो सकता है। -जस्टिस सूर्यकांत, सीजेआई
आजादी के बाद भी समाज जातियों से मुक्त नहीं। हम किस ओर बढ़ रहे हैं? नए नियमों से और पीछे जा रहे हैं
शिक्षण संस्थान समाज से अलग-थलग नहीं हो सकते। परिसर के माहौल का असर समाज पर भी पड़ेगा
भगवान के लिए अलग छात्रावास जैसे उपाय की मांग न करें। हम सब साथ रहते हैं। आज अंतरजातीय विवाह भी होते हैं
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