11 साल से स्कूल नहीं पहुंचीं शिक्षिकाएं, घर बैठे मिलता रहा वेतन; अब निलंबित, सहायता करने वाले होगी जांच  

11 साल से स्कूल नहीं पहुंचीं शिक्षिकाएं, घर बैठे मिलता रहा वेतन; अब निलंबित, सहायता करने वाले होगी जांच  

बलरामपुर में बेसिक शिक्षा विभाग से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि कुछ शिक्षक और शिक्षिकाएं लंबे समय से विद्यालय नहीं पहुंच रहे थे, लेकिन इसके बावजूद उनका वेतन लगातार जारी होता रहा। कुछ मामलों में तो वर्षों से विद्यालय से अनुपस्थित रहने की बात सामने आई है। मामला सामने आने के बाद विभाग में खलबली मच गई है और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने संबंधित शिक्षकों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की बात कही है।

श्रीदत्तगंज शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय अहिरनडीह में तैनात सहायक अध्यापक कंचन गुप्ता के लंबे समय से विद्यालय नहीं आने का मामला सामने आया है। समाचार के अनुसार, विद्यालय में उनकी अनुपस्थिति के बावजूद उपस्थिति दर्ज कर वेतन भुगतान होता रहा। हाल में अगस्त की उपस्थिति पंजिका में उनके हस्ताक्षर नहीं मिले थे। इसके बाद भी उनका पूरा वेतन जारी होने की बात सामने आई है। बीईओ द्वारा विद्यालय का निरीक्षण किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।

मामला सामने आने के बाद उपस्थिति पंजिका और वेतन भुगतान की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि संबंधित शिक्षिका की उपस्थिति दर्ज करने में विद्यालय स्तर से मदद की गई। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के संज्ञान में मामला पहुंचने के बाद अब निलंबन की कार्रवाई की बात कही गई है। विभागीय स्तर पर यह भी जांच की जाएगी कि लंबे समय तक अनुपस्थिति के बावजूद वेतन किस तरह जारी होता रहा।

2015 से वेतन निकलने का आरोप

हरैया सतघरवा शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय लंबीकोहल में तैनात शिक्षिका सोनिका और प्राथमिक विद्यालय गंजड़हवा की शिक्षिका शिवांगी शुक्ला की नियुक्ति 31 दिसंबर 2015 को हुई थी। समाचार में आरोप लगाया गया है कि नियुक्ति के बाद से दोनों शिक्षिकाएं नियमित रूप से विद्यालय नहीं पहुंचीं, जबकि उनका वेतन लगातार जारी होता रहा। इस मामले ने विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं।

बताया गया है कि करीब 11 वर्षों की इस अवधि में कई खंड शिक्षा अधिकारियों की तैनाती हुई। इनमें कपिल देव दुबे, रणजीत कुमार, अब्दुल हकीम, राजेश कुमार, रमेश चंद्र मौर्य, सियाराम वर्मा और वर्तमान में शमशेर सिंह राणा के नाम शामिल हैं। ग्रामीणों और अभिभावकों की ओर से शिकायत किए जाने की बात भी समाचार में कही गई है। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

इसी तरह हरैया सतघरवा के उच्च प्राथमिक विद्यालय देवपुरा की शिक्षिका सौम्या जायसवाल और प्राथमिक विद्यालय देवपुरा की शिक्षिका नेहा वर्मा के भी लंबे समय से विद्यालय से अनुपस्थित रहने का आरोप लगाया गया है। इन मामलों की वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

शिक्षक की जगह दूसरा व्यक्ति पढ़ा रहा था

तुलसीपुर के प्राथमिक विद्यालय कल्याणपुर से जुड़ा मामला भी सामने आया है। यहां तैनात शिक्षक निजामुद्दीन के लंबे समय से विद्यालय नहीं आने का आरोप है। समाचार के अनुसार, उनकी जगह सद्दाम नाम का एक व्यक्ति बच्चों को पढ़ा रहा था। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो यह विद्यालय की व्यवस्था और बच्चों की पढ़ाई दोनों से जुड़ा गंभीर विषय होगा।

विद्यालय में शिक्षक की जगह किसी दूसरे व्यक्ति के पढ़ाने की स्थिति में विभागीय जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। खासकर तब, जब संबंधित शिक्षक के नाम पर वेतन जारी होता रहा हो। ऐसे मामलों में केवल अनुपस्थित शिक्षक ही नहीं, बल्कि उपस्थिति दर्ज कराने या वेतन भुगतान की प्रक्रिया में सहयोग करने वाले कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच जरूरी हो जाती है।

बीईओ और लिपिकों की भूमिका की भी होगी जांच

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विकास चंद्र श्रीवास्तव ने कहा है कि विद्यालय नहीं आने वाले शिक्षकों को बख्शा नहीं जाएगा। उनके अनुसार, संबंधित शिक्षकों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की जाएगी। साथ ही जिन लोगों ने शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज कराने में सहयोग किया है, उनके खिलाफ भी विभागीय जांच कर कार्रवाई की जाएगी।

इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वर्षों तक अनुपस्थित रहने के बावजूद शिक्षकों का वेतन कैसे जारी होता रहा। यदि जांच में उपस्थिति और वेतन से जुड़े रिकॉर्ड में गड़बड़ी सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी तय हो सकती है। बीएसए ने कार्रवाई के साथ प्राथमिकी दर्ज कराने की बात भी कही है।

बच्चों की पढ़ाई सीधे तौर पर शिक्षक की नियमित उपस्थिति से जुड़ी होती है। इसलिए किसी शिक्षक का लंबे समय तक विद्यालय से दूर रहना केवल विभागीय नियमों का मामला नहीं है, बल्कि इसका असर विद्यार्थियों की शिक्षा पर भी पड़ता है। अब विभागीय जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि इन मामलों में कौन-कौन जिम्मेदार है और इतने लंबे समय तक यह व्यवस्था कैसे चलती रही।

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