अभिलेख नहीं मिलने पर शिक्षकों को फर्जी नहीं ठहरा सकते, हाईकोर्ट ने 15 सहायक शिक्षकों को दी बड़ी राहत

अभिलेख नहीं मिलने पर शिक्षकों को फर्जी नहीं ठहरा सकते, हाईकोर्ट ने 15 सहायक शिक्षकों को दी बड़ी राहत

Allahabad High Court Order: उत्तर प्रदेश में शिक्षकों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने मऊ जिले के 15 सहायक शिक्षकों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी कार्यालय में नियुक्ति से जुड़े अभिलेख नहीं मिलने मात्र से किसी शिक्षक की नियुक्ति को फर्जी या धोखाधड़ीपूर्ण नहीं माना जा सकता। अदालत ने शिक्षकों के खिलाफ की गई प्रतिकूल कार्रवाई को निरस्त करते हुए कानून के अनुसार निष्पक्ष जांच का रास्ता खुला रखा है।

मऊ जिले के रजनीश उपाध्याय समेत 14 अन्य शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। शिक्षकों ने अपने वेतन रोकने और नियुक्तियों को फर्जी बताकर की गई कार्रवाई को चुनौती दी थी। इन शिक्षकों की नियुक्तियां वर्ष 2010 से 2016 के बीच मऊ के सहायता प्राप्त विद्यालयों में हुई थीं। शिक्षकों का कहना था कि उनकी नियुक्तियों को तत्कालीन जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से अनुमोदन मिला था और वे लंबे समय से नियमित रूप से वेतन भी प्राप्त कर रहे थे।

2025 की जांच में अभिलेख नहीं मिलने पर हुई थी कार्रवाई

मामले में वर्ष 2025 में विभागीय जांच के दौरान नियुक्ति संबंधी अनुमोदन के कुछ अभिलेख उपलब्ध नहीं मिले। इसके बाद शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की गई और उनकी नियुक्तियों पर सवाल उठाए गए। शिक्षकों की ओर से कोर्ट में कहा गया कि इससे पहले वर्ष 2018 में हुई जांच में उनकी नियुक्तियों को सही पाया गया था। इसके अलावा पुलिस विवेचना में भी उनके खिलाफ धोखाधड़ी का मामला साबित नहीं हुआ था।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस पहलू पर ध्यान दिया कि किसी सरकारी कार्यालय में रिकॉर्ड उपलब्ध न होना अपने आप में नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति के फर्जीवाड़े का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार अभिलेखों का उपलब्ध न होना प्रशासनिक लापरवाही या रिकॉर्ड के रखरखाव से जुड़ी समस्या भी हो सकती है। केवल इसी आधार पर शिक्षकों को दोषी मानकर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करना उचित नहीं है।

बिना सुनवाई वेतन रोकना भी उचित नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी शिक्षक के खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। बिना Notice और Hearing के वेतन रोकना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। इस मामले में अदालत ने संबंधित प्रतिकूल रिपोर्टों और आदेशों को निरस्त कर दिया है।

हालांकि कोर्ट ने विभाग को कानून के अनुसार नए सिरे से जांच करने की छूट दी है। इसका मतलब यह है कि मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। यदि विभाग के पास नियुक्तियों से संबंधित कोई ठोस दस्तावेज या तथ्य हैं तो उनकी जांच कानून के अनुसार की जा सकती है। लेकिन जांच के दौरान प्रत्येक शिक्षक को अपना पक्ष रखने और उपलब्ध दस्तावेज प्रस्तुत करने का पूरा अवसर देना होगा।

आईटीआई में फोरमैन अनुदेशक की Outsourcing भर्ती पर भी रोक

इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों यानी ITI में फोरमैन अनुदेशक के पदों को Outsourcing के जरिए भरने से जुड़े एक अन्य मामले में भी महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने इस भर्ती प्रक्रिया से संबंधित 24 जून 2026 के शासनादेश को अगले आदेश तक स्थगित रखने का निर्देश दिया है।

यह मामला अखिलेश कुमार सिंह की याचिका से जुड़ा है। याची की ओर से कहा गया कि 24 जून को जारी शासनादेश के जरिए फोरमैन अनुदेशक के पदों को Outsourcing के माध्यम से भरने की मंजूरी दी गई थी। याचिका में दावा किया गया कि यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (अनुदेशक और फोरमैन अनुदेशक) सेवा नियमावली 2021 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकारी पक्ष से यह सवाल किया कि क्या लागू सेवा नियमावली को दरकिनार करते हुए कोई शासनादेश जारी किया जा सकता है। अदालत के समक्ष इस सवाल का संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया जा सका। इसके बाद कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्यपालिका का कोई आदेश लागू वैधानिक सेवा नियमों के विपरीत प्रक्रिया निर्धारित नहीं कर सकता।

नियमित भर्ती प्रक्रिया जारी रखने की छूट

हाईकोर्ट ने 24 जून 2026 के विवादित शासनादेश को अगले आदेश तक स्थगित रखने का निर्देश दिया है। साथ ही संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया गया है। विभाग को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करना होगा, जबकि याची को उसके बाद प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।

कोर्ट ने हालांकि विभाग को सेवा नियमावली के अनुसार नियमित भर्ती प्रक्रिया जारी रखने की छूट दी है। ऐसे में फोरमैन अनुदेशक भर्ती को लेकर आगे की प्रक्रिया अब लागू सेवा नियमों और हाईकोर्ट के आदेशों के अनुसार तय होगी।

दोनों मामलों में हाईकोर्ट के आदेशों से एक बात स्पष्ट होती है कि सरकारी नियुक्ति और सेवा संबंधी मामलों में केवल रिकॉर्ड की कमी या प्रशासनिक आदेश के आधार पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। संबंधित व्यक्ति को कानून के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना जरूरी है। वहीं, भर्ती प्रक्रिया में भी शासनादेश को लागू वैधानिक सेवा नियमों के अनुरूप होना आवश्यक है। शिक्षकों और भर्ती की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए ऐसे न्यायिक आदेश इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनका सीधा संबंध सेवा सुरक्षा और भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा होता है।

Leave a Comment