फर्जी प्रमाणपत्र के आरोप में बर्खास्त शिक्षक को बड़ी राहत, दूसरे शिक्षक का निलंबन भी स्थगित

 फर्जी प्रमाणपत्र के आरोप में बर्खास्त शिक्षक को बड़ी राहत, दूसरे शिक्षक का निलंबन भी स्थगित

Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षकों से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं। पहले मामले में फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति पाने और पुरानी नियुक्ति रद्द होने की जानकारी छिपाने के आरोप में सेवा से हटाए गए सहायक अध्यापक को राहत मिली है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिछली नियुक्ति रद्द होना अपने आप में सेवा से बर्खास्तगी नहीं माना जा सकता। वहीं दूसरे मामले में संभल के एक शिक्षक को भी अंतरिम राहत मिली है, जिन पर छात्रों से इस्लामिक प्रार्थना कराने और विशेष समुदाय का संकेत देने वाली वर्दी से जुड़े आरोप लगाए गए थे।

फर्जी प्रमाणपत्र मामले में शिक्षक को हाईकोर्ट से राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संत कबीर नगर के सहायक अध्यापक अनिल कुमार की याचिका स्वीकार करते हुए जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से 20 अप्रैल 2019 को जारी सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी अभ्यर्थी की पिछली नियुक्ति रद्द हो जाने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि उसे पहले ही सेवा से बर्खास्त किया जा चुका था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी खास तथ्य की जानकारी अभ्यर्थी से मांगी ही नहीं गई थी, तो उस तथ्य को छिपाने के लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस आधार पर कोर्ट ने शिक्षक को दी गई सेवा समाप्ति की कार्रवाई को उचित नहीं माना। यह फैसला उन शिक्षकों और अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी नियुक्ति या पुराने service record को लेकर विभागीय कार्रवाई हुई है।

29,334 सहायक अध्यापक भर्ती से जुड़ा था मामला

यह पूरा मामला वर्ष 2015 में हुई विज्ञान और गणित विषय के 29,334 सहायक अध्यापक भर्ती से जुड़ा है। अनिल कुमार का चयन गणित विषय के सहायक अध्यापक के पद पर हुआ था। उन्हें 21 सितंबर 2015 को नियुक्ति दी गई थी। इसके बाद 24 सितंबर को उन्होंने विद्यालय में कार्यभार ग्रहण किया।

सेवा में आने के लगभग एक वर्ष बाद उनकी सेवाएं स्थायी भी कर दी गईं। उस समय तक उनकी नियुक्ति और सेवा को लेकर कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आई थी। लेकिन करीब तीन साल बाद वर्ष 2018 में उनके खिलाफ शिकायत की गई कि उन्होंने कथित तौर पर फर्जी educational certificates के आधार पर नियुक्ति हासिल की है।

शिकायत के बाद विभाग की ओर से उनका वेतन रोक दिया गया। मामले में शिक्षक ने हाईकोर्ट का रुख किया। 14 नवंबर 2018 को हाईकोर्ट ने वेतन रोकने के आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बाद प्रमाणपत्रों की जांच कराई गई।

हाईस्कूल, इंटर और BSc प्रमाणपत्र सही मिले

जांच के दौरान अनिल कुमार के हाईस्कूल, इंटर और BSc के प्रमाणपत्र सही पाए गए। हालांकि B.Ed की अंकतालिका के verification की रिपोर्ट उस समय लंबित थी। इसी बीच विभाग ने 20 अप्रैल 2019 को उनकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।

शिक्षक ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम और विभागीय कार्रवाई को देखा। कोर्ट ने माना कि पुरानी नियुक्ति का रद्द होना और सेवा से बर्खास्तगी दो अलग-अलग स्थितियां हैं। केवल पहली नियुक्ति रद्द होने के आधार पर बाद की सेवा समाप्ति को सही नहीं माना जा सकता।

इस फैसले में कोर्ट की एक और टिप्पणी महत्वपूर्ण रही। कोर्ट ने कहा कि जिस जानकारी को उपलब्ध कराने या बताने के लिए अभ्यर्थी से कहा ही नहीं गया था, उसे छिपाने का आरोप लगाकर उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसी आधार पर संत कबीर नगर के BSA का सेवा समाप्ति आदेश निरस्त कर दिया गया।

संभल के शिक्षक को भी हाईकोर्ट से अंतरिम राहत

दूसरे मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल के शिक्षक मोहम्मद अजहर को भी अंतरिम राहत दी है। शिक्षक को 10 मई 2026 को संभल के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से निलंबित किया गया था। इस suspension order को शिक्षक ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

शिक्षक पर आरोप लगाया गया था कि प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान विद्यालय में छात्र इस्लामिक प्रार्थना करते थे। साथ ही ऐसी uniform पहने जाने का भी आरोप था, जिससे किसी विशेष समुदाय से संबंधित होने का संकेत मिलता था।

शिक्षक की ओर से कोर्ट में कहा गया कि जिन घटनाओं को लेकर आरोप लगाए गए हैं, उस समय वह अस्पताल में भर्ती थे। उन्हें विभाग की ओर से approved medical leave भी मिली हुई थी। इसलिए कथित प्रार्थना के समय उनकी विद्यालय में मौजूदगी नहीं थी।

विभागीय जांच पूरी होने तक निलंबन स्थगित

सुनवाई के दौरान विभाग की ओर से बताया गया कि 3 सितंबर 2026 को आरोपपत्र तैयार किया गया था और 7 सितंबर को शिक्षक को charge sheet उपलब्ध करा दी गई। विभाग ने कुछ documents का हवाला देते हुए यह भी कहा कि 14 नवंबर 2025 से पहले शिक्षक को छात्रों की प्रार्थना सभा में मौजूद दिखाया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस stage पर आरोपों की सच्चाई का अंतिम निर्णय नहीं किया जा सकता। आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला विभागीय inquiry में evidence और documents के आधार पर किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने शिक्षक को अपना पक्ष रखने और अपनी बेगुनाही साबित करने का पर्याप्त अवसर देने का निर्देश दिया। शिक्षक medical leave और अन्य संबंधित documents को जांच के दौरान पेश कर सकते हैं। कोर्ट ने विभाग को जांच कानून के अनुसार जल्द पूरी करने और preferably 15 दिन के भीतर उसे समाप्त करने का निर्देश दिया।

तीन दिन में उपलब्ध कराने होंगे संबंधित दस्तावेज

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जांच से संबंधित सभी जरूरी documents शिक्षक को तीन दिन के भीतर उपलब्ध कराए जाएं। कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच को जल्द से जल्द logical conclusion तक पहुंचाया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि विभागीय जांच पूरी होने तक शिक्षक का suspension order स्थगित रहेगा। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस राहत का अंतिम प्रभाव विभागीय जांच के परिणाम पर निर्भर करेगा। यानी हाईकोर्ट ने इस stage पर शिक्षक को पूरी तरह निर्दोष घोषित नहीं किया है, बल्कि उन्हें जांच के दौरान अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है।

शिक्षकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं ये दोनों फैसले?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के दोनों आदेशों में एक common point दिखाई देता है। विभागीय कार्रवाई करते समय केवल आरोपों के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है। संबंधित शिक्षक को अपना पक्ष रखने और उपलब्ध documents पेश करने का उचित अवसर मिलना जरूरी है।

पहले मामले में कोर्ट ने सेवा समाप्ति के आधार और पुराने नियुक्ति रिकॉर्ड के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना। वहीं दूसरे मामले में कोर्ट ने कहा कि आरोपों की वास्तविकता का फैसला विभागीय inquiry में किया जाना चाहिए। इसका मतलब यह है कि disciplinary action में procedure और natural justice की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

इन फैसलों से यह भी साफ होता है कि किसी शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई होने के बाद मामला केवल विभागीय स्तर तक सीमित नहीं रहता। यदि शिक्षक को लगता है कि कार्रवाई नियमों के विपरीत हुई है या उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया, तो वह न्यायिक remedy के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।

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