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शिक्षण में खेल प्रविधि’ का महत्व बताइए व निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण में अन्तर स्पष्ट कीजिए ||DELED 1st Semester Shikshan Adhigam Most Important Questions

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शिक्षण में खेल प्रविधि’ का महत्व बताइए व निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण में अन्तर स्पष्ट कीजिए ||DELED 1st Semester Shikshan Adhigam Most Important Questions

 

प्रश्न-‘शिक्षण में खेल प्रविधि’ का महत्व बताइए।  (2019)
उत्तरखेल विधि
(Playway Method)

बालक स्वाभाविक रूप से खेलने में रुचि लेते हैं । वे खेल के द्वारा ही अपनी इच्छाओं
की प्रवृत्तियों को प्रकट करते हैं । बालक खेलने में विशेष रुचि लेते हैं। बालक के जीवन
में खेल का विशेष महत्त्व होता है। बालकों के जीवन में खेल का इतना महत्त्व होने के कारण
बालकों को शिक्षा देने के लिए खेल विधि का आविष्कार किया गया है।
खेल की परिभाषा म्यूलिक के अनुसार “जो कार्य अपनी इच्छा से स्वतन्त्रतापूर्वक
करें वही खेल है।”
विद्यालयों में खेल का महत्त्व विद्यालयों में खेल का महत्त्व इस प्रकार है(1) खेलों के द्वारा बालकों में कुशलता का विकास किया जा सकता है
(2) खेलों के द्वारा छात्र अपनी कुशलता सम्बन्धी गुणों का परिमार्जन कर सकते हैं ।
(3) खेल सामाजिक भावना का विकास करते हैं।
(4) खेल बालकों का बौद्धिक विकास करते हैं।
(5) खेल बालकों के अनुभव में वृद्धि करते हैं ।

(6) “क्रिया द्वारा सीखना” (“Learning by Doing”) खेलों के द्वारा ही सम्भव होता
बाहर निकालना
(7) खेलों के द्वारा बालकों का शारीरिक विकास होता है।
(8) खेलों के द्वारा बालकों में सहयोग की भावना जाग्रत होती है।
(9) खेलों में अनुशासन आवश्यक होता है । इस प्रकार छात्र खेल के द्वारा स्व-अनुशासन
का पाठ पढ़ते हैं।
(10) खेल बालकों की नेतृत्व शक्ति में वृद्धि करते हैं । इसका कारण यह है कि
खेल-खेलते समय अनेक ऐसे अवसर आते हैं जब बालक को नेता के रूप में कार्य करना
पड़ता है।
(11) खेल बालकों के मानसिक तनाव को दूर करते हैं।
(12) खेलों के द्वारा छात्र-छात्राओं में आत्मविश्वास जाग्रत होता है । वे अन्य कार्यों को
भी आत्मविश्वास के साथ कर सकते हैं।

प्रश्न- बहुस्तरीय शिक्षण का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2019)

उत्तर—बहुस्तरीय शिक्षण विधि का अभिप्राय एक ऐसे शिक्षण से है जिसमें शिक्षक
दो या दो से अधिक कक्षाओं के छात्रों को एक साथ बैठाकर उनकी वैयक्तिक रुचियों
(Individual Interests) भिन्नता, उपलब्धि, अभिरुचि, मानसिक परिपक्वता को ध्यान में रखकर कार्य करता है

 

teaching technique
teaching technique

प्रश्न-निदानात्मक एवं उपचारात्मक शिक्षण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-शिक्षा में निदान का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा शिक्षा सम्बन्धी
कमजोरियों तथा कठिनाइयों के मूल कारण और प्रकृति का निर्णय लिया जाता है।
विद्यार्थियों को सीखने सम्बन्धी कठिनाइयों का ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया में शैक्षणिक
निदान और इन कठिनाइयों को दूर करते हुए शिक्षण करने को उपचारात्मक शिक्षण कहते हैं।
योकम एवं सिम्पसन के अनुसार, “उपचारात्मक शिक्षण उचित रूप से निदानात्मक

शिक्षण के बाद आता है।”
प्रश्न एक अच्छी प्रस्तावना के दो गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर—अच्छी प्रस्तावना के गुण-(1) प्रस्तावना छात्रों के पूर्व ज्ञान से
सम्बन्धित होनी चाहिए। (2) प्रस्तावना निकलवाने के प्रयोग में लायी युक्तियाँ विषय-वस्तु
के अनुरूप होनी चाहिए। (3) प्रस्तावना छात्रों में उत्साह एवं रुचि तथा पाठ को
प्रेरणात्मक रूप देने में सक्षम हो। (4) प्रस्तावना शिक्षक को उत्साह एवं पूर्ण जागृति
के साथ करनी चाहिए।

प्रश्न -शिक्षण के मूलभूत सिद्धान्त’ कौन-से हैं ?

प्रश्न–किन्हीं दो शिक्षण के सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। (2019)
प्रश्न–शिक्षण में नियोजन के सिद्धान्त’ से आप क्या समझते हैं ? (2019)
उत्तर- शिक्षण के मूलभूत सिद्धान्त
(Fundamental Theories of Teaching)
छात्रों को समुचित शिक्षण प्रदान करने के लिए आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित
(1) प्रेरणा का सिद्धान्त (Theory of Motivation)—इस सिद्धान्त का प्रयोग
बालकों में पाठ के प्रति रुचि उत्पन्न करने के लिए किया जाता है । प्रेरणा का संचार होने पर
बालक शीघ्र ही पाठ को सीखने का प्रयास करते हैं। बालकों को आस-पास के वातावरण
के बारे में भी जानकारी देनी चाहिए। आस-पास स्थित औद्योगिक कारखाने, खनिज संग्रह
बाग-बगीचा, विद्युत घर, म्यूजियम आदि के बारे में जानकारी करने के लिए उन्हें वहाँत
जाकर उनके बारे में बताना चाहिए। इनका अध्ययन करने पर उनमें अध्ययन के प्रति प्रेरणा
उत्पन्न होती है।
पठनीय एवं रुचिपूर्ण बनाने के लिए पाठ में एक आदर्श लक्ष्य निर्धारित किया जाता है
(2) रुचि का सिद्धान्त (Theory of Interest) शिक्षण के स्पष्ट, सुपाच्य,
निर्धारित लक्ष्य के द्वारा ही आगे बढ़कर पाठ में रुचि उत्पन्न की जा सकती है।

(3) जीवन से सम्बन्धित स्थापना का सिद्धान्त (Theory of Related with
Life)
इस सिद्धान्त का अभिप्राय है कि किसी विषय को पढ़ाते समय इस बात का
ध्यान रखा जाये कि जीवन में प्रयुक्त होने वाली परिस्थितियों से सम्बन्धित हो । जीवन से
सम्बन्धित विषय को बालक शीघ्र सीख लेते हैं।
(4) निश्चित उद्देश्य का सिद्धान्त (Principle of DefiniteAims) कक्षा शिक्षण
का एक प्रमुख सिद्धान्त है निश्चित उद्देश्यों का सिद्धान्त । जिसका तात्पर्य है कि प्रत्येक पाठ
का कोई-न-कोई उद्देश्य अवश्य ही निश्चित होता है। उद्देश्यों के अभाव में शिक्षक उचित
शिक्षण नहीं करा सकता । यदि पाठ के उद्देश्यों का निर्धारण पूर्व में ही कर लिया जाता है तो
शिक्षण बहुत ही स्पष्ट, व्यावहारिक, सरल, सुगम एवं रुचिकर हो जाता है साथ ही साथ
शिक्षक-शिक्षार्थी की क्रियाओं, विषय-वस्तु, विधि, प्रविधि, सहायक सामग्री,
मूल्यांकन की प्रविधि आदि का भी निर्धारण किया जाता है अत: उद्देश्यविहीन शिक्षण
निरर्थक है।
(5) चयन का सिद्धान्त (Principle of Selection)
ज्ञान विस्तृत है । उस
ज्ञान को बालक की क्षमता एवं योग्यता के अनुसार ही महत्वपूर्ण तथ्यों का चयन करके
प्रदान करना चाहिए । शिक्षक सम्पूर्ण इकाई अथवा पाठ्यक्रम को एक ही 40-45
मिनट के कालांश में प्रदान नहीं कर सकता, वह उपयुक्त एवं महत्त्वपूर्ण बातों का चयन
कर बताता है । इस हेतु उसे क्या, कब, कितना व कैसे पढ़ाना है ? वह चयन करना
आवश्यक हो जाता है।
अत: शिक्षक को उपयोगी एवं आवश्यक तथ्यों का चयन कर अनुपयोगी एवं
अनावश्यक विषय-वस्तु को त्याग देना चाहिए और अपने शिक्षण को सफल बनाना
चाहिए। इसका चयन भी शिक्षक की अपनी योग्यता पर निर्भर करता है । विषय-वस्तु
के उपर्युक्त चयन के कारण ही शिक्षा के निर्धारित किये गये उद्देश्यों के प्रति सम्भव है,
जैसे भारतीय बैंकों का शिक्षण अथवा भारतीय बैंक का ज्ञान कोई भी शिक्षक एक
कालांश में नहीं दे सकता । इनमें से एक कालांश हेतु केवल एक ही बैंक का चयन
करना पड़ेगा। इस प्रकार चयन का सिद्धान्त शिक्षण हेतु उपयोगी एवं आवश्यक सिद्धान्त
हैं इसके महत्व को बताते हुए रायबर्न लिखते हैं कि, “चयन का सिद्धान्त अति
महत्वपूर्ण है और शिक्षक की अच्छे चयन की योग्यता पर उसके कार्य की सफलता
बहुत कुछ निर्भर करती है।’
(6) नियोजन का सिद्धान्त (Theory of Planning)—पाठ्य-सामग्री चुनने
के बाद शिक्षक को क्रमबद्ध तरीके से अन्य तत्वों का निर्माण करना चाहिए । उदाहरणार्थपाठ योजना का निर्माण, सहायक सामग्री का प्रयोग, गृह-कार्य, पुनरावृत्ति आदि ।
(7) वैयक्तिक विभिन्नता का सिद्धान्त (Principle of Individual
Differences) प्रत्येक बालक की आयु के अनुसार उसकी योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिवृत्तियाँ
भिन्न-भिन्न होती हैं । अत: शिक्षक को वैयक्तिक विभिन्नताओं की जानकारी करके
शिक्षण कार्य करना चाहिए जिससे प्रत्येक स्तर पर छात्र लाभान्वित हो सकें ।

 

(8) लोकतान्त्रिक व्यवहार का सिद्धान्त (Theory of Democratic
Dealing)-शिक्षक को चाहिए कि कक्षा में स्वतन्त्रता का वातावरण उत्पन्न करे ।
अर्थात् प्रत्येक बालक को कक्षा के अन्तर्गत यह स्वतन्त्रता होनी चाहिए कि अपनी शंका
का समाधान कर सके । पाठ का विकास करने में छात्रों का पर्याप्त सहयोग भी लेना
चाहिए।
(9) विभाजन का सिद्धान्त (Theory of Division)—पाठ प्रस्तुत करने की
सरलता एवं सुविधा की दृष्टि से पाठों की छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त कर लेना
चाहिए।
रायबर्न के अनुसार “एक विभाजन दूसरे विभाजन तक पहुँचा देता है, जिसके
फलस्वरूप कक्षा के लिए समझना सहज बन जाता है
(10) आवृत्ति का सिद्धान्त (Theory of Revision)—पाठ्य-सामग्री के प्रति
छात्रों के मस्तिष्क में स्थायी विचार बनाने के लिए शिक्षक को पाठ पढ़ाने के पश्चात छात्रों
को आवृत्ति का अवसर देना चाहिए । स्थायी विचार ज्ञान प्राप्ति का स्त्रोत होते हैं।
(11) निर्माण एवं मनोरंजन का सिद्धान्त (Theory of Construction and
Recreation)—छात्रों में रचनात्मक एवं सृजनात्मक शक्ति का विकास करने हेतु उनसे
रचनात्मक एवं मनोरंजनपूर्ण क्रियाएँ करानी चाहिए । खेल-खेल अथवा मनोरंजन में वे
अपने पाठ को स्वत: ही सीख लेंगे।
(12) पाठ्य-सामग्री के चयन का सिद्धान्त (Principle of Selection of Subject
Matter)—पाठ्य-सामग्री चुनते समय शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिए कि कि वह
छात्रों के स्तर के अनुकूल हो साथ ही उससे शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके । जहाँ तक
सम्भव हो पाठ्य-वस्तु में उपयोगी तत्वों का ही समावेश होना चाहिए ।
(13) मनोवैज्ञानिकता का सिद्धान्त (Theory of Psychologic) शिक्षण में
शिक्षकों को मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग करना चाहिए जिससे कि छात्र वांछित दिशा
में अपना कार्य कर सकें । प्रत्येक बालक की रुचियों और बौद्धिक क्षमताओं को ध्यान में
रखकर पाठ्यक्रम एवं पाठ योजना का क्रियान्वयन करना चाहिए।
प्रश्न शिक्षण सिद्धान्तों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिए।
शिक्षण-सिद्धान्तों की आवश्यकता
(Needs of Theory of Teaching)
(1) अधिगम के लिए समुचित परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए शिक्षण-सिद्धान्त
आवश्यक हैं।
(2) शिक्षण-सिद्धान्तों के द्वारा शिक्षण प्रक्रिया में युक्त आश्रित एवं स्वतन्त्र चरों की
जानकारी शिक्षक के ज्ञान, पूर्वकथन तथा नियन्त्रण में वृद्धि होती है।
(3) शिक्षण सिद्धान्तों द्वारा, शिक्षक के ज्ञान, पूर्वकथन तथा नियन्त्रण में वृद्धि
उत्तरहोती है।

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