फर्जी TET प्रमाणपत्र से मिली सरकारी नौकरी शुरू से शून्य, नियमित विभागीय जांच जरूरी नहीं
प्रयागराज। फर्जी TET प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वालों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति जिस TET certificate के आधार पर हुई है, वह निर्णायक रूप से फर्जी साबित हो जाता है, तो ऐसी नियुक्ति को शुरुआत से ही शून्य यानी Void Ab Initio माना जाएगा। ऐसी स्थिति में नियुक्ति समाप्त करने को दंडात्मक बर्खास्तगी नहीं माना जाएगा।
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने कहा कि फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर हुई नियुक्ति को समाप्त करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के तहत नियमित departmental inquiry कराना हर मामले में जरूरी नहीं है। ऐसे मामलों में कर्मचारी को Show Cause Notice देकर अपना पक्ष रखने का अवसर देना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना पर्याप्त हो सकता है। इसका मतलब यह है कि जब नियुक्ति की मूल योग्यता ही फर्जी प्रमाणपत्र पर आधारित पाई जाती है, तो मामला सामान्य disciplinary action से अलग हो जाता है।
2013 TET प्रमाणपत्र से जुड़ा था मामला
यह मामला वर्ष 2013 की उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी UP TET के आधार पर बेसिक शिक्षा विभाग के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक पद पर नियुक्त किए गए अभ्यर्थियों से जुड़ा था। वर्ष 2018 के शासनादेश के तहत वर्ष 2010 के बाद हुई नियुक्तियों की जांच की जा रही थी। इसी प्रक्रिया में संबंधित शिक्षकों के TET certificates का online record से मिलान कराया गया।
जांच के दौरान संबंधित अनुक्रमांक का परीक्षा परिणाम ऑनलाइन रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं मिला। इसके बाद संबंधित शिक्षकों का वेतन रोक दिया गया और उन्हें Show Cause Notice जारी किया गया। मामले की आगे जांच के बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, इटावा ने 13 जून 2022 को उनकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया। इसके खिलाफ संबंधित कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
केवल रिकॉर्ड में विसंगति मिलने पर नौकरी खत्म नहीं की जा सकती
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया है। कोर्ट के अनुसार, केवल इतना सामने आना कि किसी TET certificate या उसके record में कोई discrepancy है, अपने आप में प्रमाणपत्र को फर्जी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि certificate की authenticity को लेकर verification की जरूरत है, तो संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति को तुरंत फर्जी मानकर समाप्त नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, जब जांच के बाद प्रमाणपत्र के फर्जी होने की बात निर्णायक रूप से स्थापित हो जाती है और उसी प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति मिली थी, तो ऐसी नियुक्ति की कानूनी स्थिति अलग होगी। कोर्ट के अनुसार ऐसी appointment शुरुआत से ही वैध नहीं मानी जाएगी। इसलिए लंबे समय तक नौकरी करने मात्र से फर्जी प्रमाणपत्र पर आधारित नियुक्ति वैध नहीं हो जाती।
नियमित विभागीय जांच की जरूरत नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फर्जी प्रमाणपत्र पर मिली नियुक्ति समाप्त करना सामान्य अर्थों में disciplinary punishment नहीं है। इसका कारण यह है कि नियुक्ति की बुनियाद ही ऐसे प्रमाणपत्र पर थी जो बाद में फर्जी साबित हुआ। इसलिए उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के तहत होने वाली सामान्य departmental inquiry को हर ऐसे मामले में अनिवार्य नहीं माना जा सकता।
हालांकि, इसका यह अर्थ भी नहीं है कि कर्मचारी को बिना किसी अवसर के सेवा से बाहर किया जा सकता है। संबंधित व्यक्ति को Show Cause Notice के माध्यम से अपना पक्ष रखने का अवसर देना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना जरूरी रहेगा। यानी प्रशासन को फर्जी प्रमाणपत्र के संबंध में ठोस और निर्णायक आधार प्रस्तुत करना होगा।
शिक्षकों और TET अभ्यर्थियों के लिए क्या है इसका मतलब?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश TET certificate verification और सरकारी शिक्षक भर्ती से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। खासतौर पर उन मामलों में जहां नियुक्ति की पात्रता किसी TET certificate पर निर्भर थी। विभागीय स्तर पर certificate verification के दौरान यदि कोई रिकॉर्ड mismatch मिलता है, तो पहले उसकी वास्तविकता की जांच जरूरी होगी।
वहीं, यदि जांच में यह निर्णायक रूप से सामने आता है कि certificate वास्तव में फर्जी था और उसी के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त की गई थी, तो केवल लंबे समय तक सेवा करने या वेतन प्राप्त करने से नियुक्ति को वैधता नहीं मिलेगी। ऐसे मामलों में नियुक्ति को शुरुआत से शून्य मानकर सेवा समाप्त करने की कार्रवाई की जा सकती है।
