अपनी सैलरी से सरकारी स्कूल की बदली तस्वीर, शिक्षिका सैयदा की प्रेरक कहानी
पीलीभीत: शिक्षक दिवस के मौके पर उन शिक्षकों को सम्मानित किया जा रहा है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसे 81 शिक्षकों का चयन राज्य शिक्षक पुरस्कार के लिए किया है। इनमें पीलीभीत के मरौरी ब्लॉक स्थित प्राथमिक विद्यालय पिपरिया अगरू की प्रधान अध्यापिका सैयदा भी शामिल हैं। उनकी कहानी बताती है कि अगर शिक्षक के अंदर कुछ बदलने का जुनून हो, तो सीमित संसाधनों वाला सरकारी स्कूल भी मॉडल स्कूल बन सकता है।
सैयदा ने वर्ष 2013 में प्राथमिक विद्यालय पिपरिया अगरू की जिम्मेदारी संभाली थी। उस समय स्कूल की स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी। विद्यालय में करीब 58 बच्चे पंजीकृत थे, लेकिन नियमित रूप से लगभग 30 बच्चे ही स्कूल आते थे। स्कूल के आसपास कूड़े के ढेर लगे थे और पुराना भवन भी जर्जर हालत में था। इन परिस्थितियों के कारण अभिभावक भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने में हिचकते थे। सैयदा ने इन समस्याओं को चुनौती के रूप में लिया और स्कूल की तस्वीर बदलने की शुरुआत की।
उन्होंने सबसे पहले विद्यालय के लिए जरूरी संसाधन जुटाने पर ध्यान दिया। ग्राम प्रधान, ग्रामीणों, समाजसेवियों और अन्य लोगों के सहयोग से स्कूल में फर्नीचर की व्यवस्था कराई गई। शिक्षकों ने मिलकर विद्यालय के आसपास से कूड़े के ढेर हटवाए और ग्रामीणों के बीच जागरूकता अभियान चलाया। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा सरकारी स्कूल पर बढ़ने लगा। इसका असर स्कूल के नामांकन पर भी दिखाई दिया और बच्चों की संख्या बढ़कर करीब 152 तक पहुंच गई।
सैयदा ने केवल स्कूल की सफाई और फर्नीचर तक ही खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपनी निजी तनख्वाह से प्रोजेक्टर और लैपटॉप खरीदा, ताकि बच्चों को स्मार्ट क्लास के माध्यम से पढ़ाया जा सके। बिजली की समस्या से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए इनवर्टर और बैटरी की व्यवस्था भी कराई गई। स्कूल में आधुनिक लाइब्रेरी तैयार की गई, जिसमें 200 से अधिक ज्ञानवर्धक और रोचक किताबें उपलब्ध हैं। बच्चे लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ते हैं और बड़ी स्क्रीन पर प्रेरणादायक कहानियां भी देखते हैं।
आज प्राथमिक विद्यालय पिपरिया अगरू की तस्वीर पहले से बिल्कुल अलग है। बारिश के दौरान भी बच्चों की उपस्थिति बनी रहती है। स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों के लिए तकनीक, पुस्तकालय और बेहतर बैठने की व्यवस्था उपलब्ध है। सैयदा और विद्यालय के पूरे स्टाफ की मेहनत का परिणाम यह रहा कि स्कूल ने अपने पहले ही प्रयास में ‘निपुण विद्यालय’ का दर्जा हासिल किया।
सैयदा ने 15 नवंबर 2008 को सहायक अध्यापक के रूप में अपनी शिक्षक यात्रा शुरू की थी। मई 2013 में जब उन्होंने पिपरिया अगरू विद्यालय की जिम्मेदारी संभाली, तब वहां कई बुनियादी सुविधाओं का अभाव था। वर्ष 1978 में बने पुराने भवन को बेहतर बनाना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी जिम्मेदारी मानकर लगातार काम किया। उनकी मेहनत में विद्यालय के अन्य शिक्षकों और ग्रामीणों का भी सहयोग मिला।
विद्यालय की शिक्षामित्र शिखा मिश्रा भी सैयदा के प्रयासों को याद करते हुए बताती हैं कि 2013 में जब उन्होंने विद्यालय की जिम्मेदारी संभाली थी, तब कई कमियां थीं। एक महिला शिक्षक के रूप में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। अपनी सैलरी से उन्होंने स्कूल के लिए कई जरूरी सामान उपलब्ध कराए। स्टाफ और उनके संयुक्त प्रयासों से बच्चों की संख्या भी लगातार बढ़ी।
अभिभावकों का भरोसा जीतना भी इस बदलाव की बड़ी उपलब्धि है। अभिभावक रविंद्र कुमार के अनुसार, स्कूल की व्यवस्था से प्रभावित होकर लोग अपने बच्चों को यहां पढ़ाने भेज रहे हैं। उनका कहना है कि विद्यालय की पढ़ाई, फर्नीचर, प्रोजेक्टर, पुस्तकालय और स्टाफ की व्यवस्था काफी अच्छी है। बच्चों को एक ही परिसर में पढ़ाई के लिए जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं।
सबसे खास बात यह है कि राज्य शिक्षक पुरस्कार के साथ मिलने वाली 25,000 रुपये की पुरस्कार राशि को भी सैयदा अपने लिए खर्च नहीं करना चाहतीं। उनका कहना है कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि बच्चों और पूरे विद्यालय स्टाफ की मेहनत का परिणाम है। पुरस्कार की राशि भी वह विद्यालय के विकास, वॉल पेंटिंग और अन्य जरूरी कार्यों में लगाने की योजना बना रही हैं।
सैयदा की कहानी केवल एक सरकारी स्कूल के बदलने की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है, जिसमें शिक्षक अपनी जिम्मेदारी को नौकरी से आगे बढ़कर मिशन मानता है। उन्होंने साबित किया है कि स्कूल को बेहतर बनाने के लिए हमेशा बड़े बजट की जरूरत नहीं होती। सच्ची लगन, साहस, मेहनत और बच्चों के प्रति समर्पण हो तो सरकारी विद्यालय भी किसी मॉडल स्कूल से कम नहीं हो सकता।
