TET News: मार्च 2015 से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवा सुरक्षित, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी 

TET News: मार्च 2015 से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवा सुरक्षित, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी 

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के शिक्षकों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में मार्च 2015 से पहले नियुक्त और निर्धारित अवधि में TET उत्तीर्ण कर चुके शिक्षक की सेवा को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कुशीनगर के सहायक अध्यापक मोहम्मद मुस्तफा सिद्दीकी की विशेष अपील स्वीकार करते हुए उनकी बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है। यह फैसला उन शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी नियुक्ति 31 मार्च 2015 से पहले हुई थी और जिन्होंने इसके बाद नहीं बल्कि निर्धारित समय सीमा के भीतर TET की योग्यता हासिल कर ली थी।

मृतक आश्रित कोटे में हुई थी नियुक्ति

मामला कुशीनगर के बाल बारी जूनियर हाईस्कूल, कसया से जुड़ा है। मोहम्मद मुस्तफा सिद्दीकी की नियुक्ति मृतक आश्रित नियमावली, 1974 के तहत सहायक अध्यापक के पद पर की गई थी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने वर्ष 2011 में विद्यालय में कार्यभार ग्रहण किया था।

नियुक्ति के बाद उन्होंने शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET भी उत्तीर्ण की। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने 22 फरवरी 2014 को TET पास किया था। यानी उनकी नियुक्ति भी 31 मार्च 2015 से काफी पहले हुई थी और TET की योग्यता भी निर्धारित तारीख से पहले हासिल कर ली गई थी।

इसके बावजूद बाद में उनकी सेवा समाप्त कर दी गई। शिक्षक ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। मामला आगे बढ़ते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ के सामने पहुंचा।

हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी को अवैध माना

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने की। खंडपीठ ने शिक्षक की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी की कार्रवाई को अवैध करार दिया।

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने उस शिक्षक के मामले में नियुक्ति और TET योग्यता हासिल करने की समय-सीमा को महत्वपूर्ण माना। शिक्षक की नियुक्ति 31 मार्च 2015 से पहले हुई थी और उन्होंने फरवरी 2014 में TET पास कर लिया था। ऐसे में उनकी सेवा को केवल बाद की कार्रवाई के आधार पर समाप्त करना उचित नहीं माना गया।

यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में TET की अनिवार्यता और पुराने शिक्षकों की सेवा को लेकर कई तरह के मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे में इस निर्णय ने पुराने नियुक्त शिक्षकों के बीच भी ध्यान खींचा है।

शिक्षक की नियुक्ति का पूरा मामला क्या था?

मोहम्मद मुस्तफा सिद्दीकी की नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया से नहीं बल्कि मृतक आश्रित कोटे के तहत हुई थी। मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक और सामाजिक संकट से बचाने के उद्देश्य से आश्रित नियुक्ति की व्यवस्था की गई है।

इसी व्यवस्था के तहत उन्हें सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के बाद उन्होंने विद्यालय में सेवा शुरू की। इसके बाद उन्होंने TET परीक्षा भी पास की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 22 फरवरी 2014 को TET उत्तीर्ण करने के बावजूद बाद में उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।

यही कार्रवाई विवाद का मुख्य कारण बनी। शिक्षक की ओर से अदालत में अपनी नियुक्ति और TET योग्यता से जुड़े तथ्यों को रखा गया। मामले में यह भी महत्वपूर्ण रहा कि नियुक्ति काफी पहले हो चुकी थी और TET की योग्यता भी 31 मार्च 2015 से पहले हासिल की जा चुकी थी।

31 मार्च 2015 की तारीख क्यों महत्वपूर्ण है?

इस मामले में 31 मार्च 2015 की तारीख खास महत्व रखती है। शिक्षा के अधिकार कानून यानी RTE Act के तहत शिक्षक नियुक्तियों में TET की योग्यता से जुड़े प्रावधान लागू हुए। इसी वजह से पुराने नियुक्त शिक्षकों की सेवा को लेकर कई बार कानूनी सवाल उठते रहे हैं।

ऐसे मामलों में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि किसी शिक्षक ने TET कब पास किया। नियुक्ति कब हुई, नियुक्ति किस नियम के तहत हुई, उस समय लागू नियम क्या थे और शिक्षक ने बाद में आवश्यक योग्यता हासिल की या नहीं—इन सभी तथ्यों को देखा जाता है।

मोहम्मद मुस्तफा सिद्दीकी के मामले में नियुक्ति 2011 में हुई थी और TET उन्होंने फरवरी 2014 में पास किया। यानी दोनों महत्वपूर्ण घटनाएं 31 मार्च 2015 से पहले की हैं। इसी तथ्य ने मामले को अलग महत्व दिया।

पुराने शिक्षकों के लिए फैसले का क्या मतलब?

हाईकोर्ट के इस फैसले को पुराने नियुक्त शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह बताता है कि प्रत्येक मामले में नियुक्ति की तारीख और शिक्षक की योग्यता हासिल करने की स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है।

हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि 31 मार्च 2015 से पहले नियुक्त हर शिक्षक की नौकरी स्वतः सुरक्षित हो गई है। किसी भी शिक्षक की सेवा का मामला उसकी नियुक्ति की परिस्थितियों, लागू नियमों, TET योग्यता और संबंधित न्यायिक आदेश पर निर्भर करेगा।

इसलिए इस फैसले को एक विशेष मामले में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय के रूप में समझना ज्यादा उचित होगा। अन्य शिक्षकों के मामलों में भी समान तथ्य होने पर यह निर्णय कानूनी रूप से महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है, लेकिन प्रत्येक मामले का अंतिम परिणाम उसके अपने तथ्यों और लागू नियमों पर निर्भर करेगा।

मृतक आश्रित नियुक्ति को लेकर भी अहम संदेश

इस मामले का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मृतक आश्रित कोटे में हुई नियुक्ति है। ऐसे मामलों में परिवार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नियुक्ति की जाती है। इसलिए नियुक्त व्यक्ति की सेवा समाप्त करने से पहले नियुक्ति के मूल आधार और उस समय लागू नियमों को ध्यान में रखना जरूरी होता है।

मुस्तफा सिद्दीकी ने 2011 में नियुक्ति के बाद सेवा शुरू की थी। उन्होंने बाद में TET भी पास किया। इसके बावजूद उनकी सेवा समाप्त कर दी गई। हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए बर्खास्तगी को अवैध माना और विशेष अपील स्वीकार की।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पुराने मामलों में केवल किसी एक योग्यता या दस्तावेज को देखकर सेवा समाप्त करने की कार्रवाई नहीं की जा सकती। नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया और कर्मचारी द्वारा बाद में पूरी की गई योग्यता भी महत्वपूर्ण होती है।

शिक्षकों के बीच क्यों बढ़ी इस फैसले की चर्चा?

उत्तर प्रदेश में सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों के लिए TET लंबे समय से एक महत्वपूर्ण योग्यता रही है। समय-समय पर TET की अनिवार्यता, नियुक्ति की तारीख और योग्यता पूरी करने को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं।

ऐसे माहौल में जब किसी पुराने नियुक्त शिक्षक के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला आता है तो स्वाभाविक रूप से दूसरे शिक्षक भी उसके कानूनी प्रभाव को समझने की कोशिश करते हैं। खासकर वे शिक्षक जिनकी नियुक्ति पुरानी है और जिन्होंने बाद में TET या अन्य निर्धारित योग्यता हासिल की है, वे इस तरह के फैसलों पर नजर रखते हैं।

लेकिन शिक्षकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि समाचार रिपोर्ट में बताए गए फैसले को अपनी सेवा पर सीधे लागू मानने से पहले मूल न्यायिक आदेश और अपने नियुक्ति दस्तावेजों की स्थिति देखना जरूरी है।

हाईकोर्ट के फैसले से क्या बदला?

इस मामले में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि मोहम्मद मुस्तफा सिद्दीकी की बर्खास्तगी को न्यायालय ने अवैध माना और उनकी विशेष अपील स्वीकार कर ली। इसका सीधा लाभ संबंधित शिक्षक को मिलता है।

मामले के तथ्य यह बताते हैं कि शिक्षक की नियुक्ति वर्ष 2011 में हुई थी और उन्होंने फरवरी 2014 में TET पास किया था। दोनों घटनाएं 31 मार्च 2015 से पहले की हैं। इसलिए यह मामला पुराने नियुक्त शिक्षकों के लिए कानूनी रूप से महत्वपूर्ण बन गया है।

हालांकि, इसे किसी व्यापक सरकारी आदेश की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। हाईकोर्ट का फैसला संबंधित मामले के तथ्यों पर आधारित है। दूसरे शिक्षकों के मामलों में भी समान परिस्थितियां हैं या नहीं, यह अलग से देखा जाना जरूरी होगा।

शिक्षकों के लिए जरूरी बात

इस फैसले के बाद पुराने नियुक्त शिक्षकों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही हो सकता है कि क्या उनकी सेवा भी इसी आधार पर सुरक्षित मानी जाएगी। इसका जवाब सीधे तौर पर हां या नहीं में देना उचित नहीं होगा।

यदि किसी शिक्षक की नियुक्ति 31 मार्च 2015 से पहले हुई है और उसने TET भी निर्धारित अवधि में पास किया है, तो इस फैसले के तथ्य उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन नियुक्ति का प्रकार, विद्यालय का दर्जा, उस समय लागू नियम, नियुक्ति की वैधता और TET प्रमाणपत्र समेत सभी दस्तावेजों की जांच जरूरी होगी।

इसलिए शिक्षकों को किसी भी कार्रवाई के मामले में संबंधित विभागीय आदेश और न्यायालय के मूल निर्णय को जरूर देखना चाहिए। जरूरत पड़ने पर कानूनी विशेषज्ञ की सलाह लेना भी उचित रहेगा।

Leave a Comment